एक्सक्लूसिव रिपोर्ट

इजरायली मंत्री के “अल अक्सा” मस्जिद के दौरे से मिडिल ईस्ट में बढ़ा तनाव, अमेरिका ने भी इजरायल के इस कदम का किया विरोध – राजेंद्र दूबे (स्पेशल एडिटर)


सांकेतिक तस्वीर।

यरुशलम। फिलिस्तीनी आतंकी संगठन “हमास” के धमकियों को नजर अंदाज करते हुए पिछले दिनों इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर ने पूर्वी यरुशलम में अल-अक्सा मस्जिद परिसर के फ्लैशपॉइंट पवित्र स्थल का दौरा करने के बाद से हीं मिडिल-ईस्ट के मुस्लिम देशों ने विरोध शुरू कर दिया है। हालांकि,इस विरोध की पहले ही आशंका थी, यही कारण था कि इस मस्जिद के दौरे के समय इजरायली मंत्री बेन-गवीर के साथ उनकी सुरक्षा में भारी संख्या में इजरायली फोर्स भी मौजूद रही। इस बीच अमेरिका ने इजरायल के इस कदम से नाराजगी जाहिर की है।

वहीं,फिलिस्तीनी राष्ट्रपति के प्रवक्ता नबील अबू रुदिनेह के हवाले से बेन-गवीर की अल-अक्सा की यात्रा की निंदा करने की जानकारी सामने आई है। बता दे कि पिछले पांच सालों में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी इजरायली मंत्री ने अल-अक्सा मस्जिद का दौरा कर फिलिस्तीन, अरब देश और अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय को एक चुनौती दी है। इस दौरान जॉर्डन ने अम्मान में इजरायल के राजदूत को तलब किया और कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि इजरायल ऐसे सभी उल्लंघनों को तुरंत बंद करे।

इस बीच आतंकी संगठन हमास ने अपने धमकी को एक बार फिर से दोहराते हुए एक बयान में इजरायली मंत्री की यात्रा की निंदा करते हुए कहा कि फिलिस्तीनी लोग अपने पवित्र स्थानों और अल-अक्सा मस्जिद की रक्षा करना जारी रखेंगे। अमेरिका ने भी कहा है कि अगर इजरायल ने इस मस्जिद की यथास्थिति को बदलने की कोशिशें की तो फिर ठीक नहीं होगा।

ऐसे में अब यह साफ हो चला है कि मिडिल ईस्ट में एक बार फिर तनाव आपने चरम पर है। ऐसी स्थिति में अमेरिका ने भी संकेत दे दिया है कि इस घटनाक्रम में वह इजरायल का साथ नही दे सकेगा। हालांकि,अमेरिका जैसे मित्र देश के इस रवैये से इजरायल पर कोई बड़ा फर्क पड़ता नहीं दीख रहा है। लेकिन यहां यह भी साफ कर दें कि यह कोई पहला मौका नहीं है जब अमेरिका इस तरह से इजरायल के साथ पेश आ रहा है। क्योंकि, अभी हाल ही में इजरायल के वेस्टलैंड में फिलिस्तीनी नागरिकों द्वारा किये जा रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान एक फिलिस्तीनी महिला पत्रकार की मौत हो जाने पर अमेरिका ने इस पत्रकार की मौत का जांच करने का ऐलान किया था,जिस पर इजरायल ने तीखी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि वह सहयोग नहीं करेगा। फिलहाल,तनाव अपने शबाब पर है, अब आगे क्या होता है ? कह पाना मुश्किल है।

गौरतलब है कि सन् 1948 से, जॉर्डन के एक निकाय, यरुशलम इस्लामिक वक्फ पवित्र स्थल की देखभाव कर रहा है। इजरायल और जॉर्डन के बीच सन् 1967 के एक समझौते के तहत, गैर-मुस्लिम उपासक परिसर में जा सकते हैं, लेकिन वहां प्रार्थना करना प्रतिबंधित है। यरुशलम स्थित यह मस्जिद येनूस्‍को की वर्ल्‍ड हैरिटेज साइट में शामिल हैं। इस मस्जिद को इस्‍लाम में तीसरी सबसे पवित्र जगह माना जाता है।

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