स्पेशल रिपोर्ट

SU-30 फाइटर प्लेन में मिसाइल न होने के कारण ही आर्मेनिया युद्ध हार गया था – सतीश उपाध्याय (सीनियर एडिटर)

येरेवन
नागोर्नो-कारबाख की जंग में अजरबैजान के हाथों बुरी तरह हारने के बाद आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिनियन लगातार निशाने पर हैं। यही कारण है कि हाल में ही सेना के एक विद्रोही धड़े ने उनके खिलाफ बगावत की आवाज बुलंद की थी। पीएम पशिनियन पर आरोप है कि उन्होंने युद्ध के दौरान रूस से खरीदे गए सुखोई एसयू-30एसएम लड़ाकू विमानों का उपयोग नहीं किया।
युद्ध खत्म होने के करीब चार महीने बाद चुप्पी तोड़ते हुए पीएम पशिनियन ने दावा किया है कि हमने जो लड़ाकू विमान रूस से खरीदे थे, उनमें मिसाइलें नहीं लगी हुईं थीं। इस कारण युद्ध के मैदान में इन लड़ाकू विमानों का उपयोग नहीं किया गया था। दरअसल, रूस ने दूसरे देशों में Su-30SM के लिए मिसाइलों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया हुआ है।

रूस ने बिना मिसाइलों के बेचे थे लड़ाकू विमान
उन्होंने कहा कि नागोर्नो-कारबाख के युद्ध के कुछ महीने पहले मई 2020 में ही रूस से सुखोई एसयू-30 लड़ाकू विमानों की खरीद की थी। हमारे पास युद्ध से पहले मिसाइलों को खरीदने का समय नहीं था। अब हम लड़ाकू विमानों और मिसाइलों की खरीद करेंगे। इससे पहले आर्मेनिया की सेना के पूर्व चीफ जनरल स्टाफ मूव्स हकोबयान ने नवंबर में कहा था कि उनके लड़ाकू विमानों के पास कोई भी मिसाइल नहीं थी। वे हथियारों के बिना युद्ध में नहीं जा सकते थे।

लगभग 2 महीनों तक चला था युद्ध
सितंबर 2020 के अंत में नागोर्नो-कारबाख में आर्मीनिया और अजरबैजान के बीच शुरू हुआ युद्ध 10 नवंबर तक जारी रहा। इस दौरान दोनों ही पक्षों के सैकड़ों लोग और सेना के जवान मारे गए। युद्ध के दौरान दोनों ही देशों ने एक दूसरे के ऊपर नागरिक आबादी पर हमला करने का आरोप लगाया था। हालांकि, ऐसे किसी भी दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकी। अब रूस की मध्यस्थता से नागोर्नो-काराबाख में शांति बनी हुई है।

किस मुद्दे को लेकर दोनों देशों में छिड़ी जंग
दोनों देश 4400 वर्ग किलोमीटर में फैले नागोर्नो-काराबाख नाम के हिस्से पर कब्जा करना चाहते हैं। नागोर्नो-काराबाख इलाका अंतरराष्‍ट्रीय रूप से अजरबैजान का हिस्‍सा है लेकिन उस पर आर्मेनिया के जातीय गुटों का कब्‍जा है। 1991 में इस इलाके के लोगों ने खुद को अजरबैजान से स्वतंत्र घोषित करते हुए आर्मेनिया का हिस्सा घोषित कर दिया। उनके इस हरकत को अजरबैजान ने सिरे से खारिज कर दिया। इसके बाद दोनों देशों के बीच कुछ समय के अंतराल पर अक्सर संघर्ष होते रहते हैं।

क्या है इस संघर्ष का इतिहास
आर्मेनिया और अजरबैजान 1918 और 1921 के बीच आजाद हुए थे। आजादी के समय भी दोनों देशों में सीमा विवाद के कारण कोई खास मित्रता नहीं थी। पहले विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद इन दोनों देशों में से एक तीसरा हिस्सा Transcaucasian Federation अलग हो गया। जिसे अभी जार्जिया के रूप में जाना जाता है। 1922 में ये तीनों देश सोवियत यूनियन में शामिल हो गए। इस दौरान रूस के महान नेता जोसेफ स्टालिन ने अजरबैजान के एक हिस्से (नागोर्नो-काराबाख) को आर्मेनिया को दे दिया। यह हिस्सा पारंपरिक रूप से अजरबैजान के कब्जे में था लेकिन यहां रहने वाले लोग आर्मेनियाई मूल के थे।

दोनों देशों में 1991 से भड़का तनाव
1991 में जब सोवियत यूनियन का विघटन हुआ तब अजरबैजान और आर्मेनिया भी स्वतंत्र हो गए। लेकिन, नागोर्नो-काराबाख के लोगों ने इसी साल खुद को अजरबैजान से स्वतंत्र घोषित करते हुए आर्मेनिया में शामिल हो गए। इसी के बाद दोनों देशों के बीच जंग के हालात बन गए। लोगों का मानना है कि जोसेफ स्टालिन ने आर्मेनिया को खुश करने के लिए नागोर्नो-काराबाख को सौंपा था।

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