एक्सक्लूसिव रिपोर्ट

मिडिल-ईस्ट में जारी जंगी तनातनी के बीच अमेरिका ने सऊदी अरब में एक नया मिलिट्री बेस बनाने का किया बड़ा फैसला, ईरान और हूती विद्रोहियों की ओर से बढ़ते खतरे को देखते हुए लिया गया निर्णय – विजयशंकर दूबे/राजेंद्र दूबे


सांकेतिक तस्वीर।

वाशिंग्टन/रियाद। मिडिल-ईस्ट में बढ़ते जंगी तनातनी के बीच अमेरिका ने सऊदी अरब में नई मिलिट्री बेस बनाने का फैसला किया है। बता दे कि यह मिलिट्री बेस एक टेस्टिंग फैसिलिटी के तौर पर काम करेगा,जहां अमेरिकी सेना तैनात होगी। इस फैसिलिटी में एंटी ड्रोन तकनीक और इंट्रीग्रेटेड एयर एंड मिसाइल डिफेंस सिस्टम की टेस्टिंग की जाएगी। दरअसल,अमेरिकी नौसेना की सेंट्रल कमांड के हवाले से बताया गया है कि इस योजना पर लंबे समय से काम चल रहा था। चूंकि,सेंटकॉम मध्य-पूर्व और ईरान के इलाके में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों का संचालन करती है।

हालांकि,अमेरिका के इस मिलिट्री बेस के लिए अभी तक लोकेशन निर्धारित नहीं हुआ है। क्योंकि,कोशिश है कि कम आबादी वाले लोकेशन इस बेस के लिए बेहतर होंगे। ताकि आम लोगों को प्रभावित किए बिना इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, सिग्नल जैमिंग और डायरेक्ट एनर्जी वेपन की टेस्टिंग की जा सकती है।

इसी बीच एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से यह दावा किया गया है कि इस नये बेस का मुख्य उद्देश्य ईरान के खिलाफ अरब देशों और इजरायल के बीच बढ़ते सुरक्षा सहयोग के लिए है। क्योंकि ईरान ने हाल के कुछ वर्षों में अपने शस्त्रागार में बड़े पैमाने पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन का निर्माण किया है।

हूती विद्रोही भी सऊदी अरब के लिए सालों से एक बड़ा सिरदर्द है। यमन के हूती विद्रोही ईरान में बने ड्रोन के जरिए सऊदी अरब के तेल फैसिलिटी पर हमला भी कर रहे हैं। पिछले कुछ साल में हूती विद्रोहियों के हमले में सऊदी अरब को भारी नुकसान भी झेलना पड़ा है। वे सऊदी के बुनियादी ढांचे और सैन्य फैसिलिटी को भी निशाना बना रहे हैं। ऐसे में सऊदी अरब में बढ़ते मिसाइल और ड्रोन हमलों से क्षेत्रीय सहयोगी और अमेरिकी सेना चिंतित हैं। जुलाई में राष्ट्रपति जो बाइडेन की मध्य पूर्व की यात्रा के दौरान, अमेरिकी अधिकारियों ने क्षेत्रीय सरकारों के लिए अपनी मिसाइल सुरक्षा को मजबूत करने का जिक्र भी किया था। इन्हीं सब कारणों को ध्यान में रखते हुए अमेरिका ने यह फैसला लिया है।

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