
सांकेतिक तस्वीर।
काबुल/इस्लामाबाद। अपने फायदे के लिए चीन की अपने ही दोस्त पाकिस्तान के खिलाफ जारी साजिश अब दम तोड़ती दिख रही है। दरअसल,इस्लामाबाद ने साफ कर दिया है कि वह आतंकी संगठन टीटीपी के किसी भी असंवैधानिक मांगों को स्वीकार नहीं करेगा। इतना ही नहीं, इस खूंखार आतंकवादी संगठन के साथ शांति समझौता पाकिस्तानी संविधान के अनुसार सख्ती से होगा। इसको संसद से आम मंजूरी मिलने के बाद ही लागू किया जाएगा। बता दे कि पाकिस्तानी तालिबान कहे जाने वाले टीटीपी की प्रमुख मांग पाकिस्तान में इस्लामिक शरिया कानून लागू करने और अपने आतंकी संगठन के लिए किसी खाड़ी देश में एक राजनीतिक कार्यालय खोलने की है। जिसे पाकिस्तानी सरकार पहले ही सिरे से खारिज कर चुकी है।
बताते चले कि टीटीपी के साथ हुए शांति समझौते को लेकर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अध्यक्षता में पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा पर एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई थी। इसमें सरकार के कई मंत्रियों और अधिकारियों के अलावा शीर्ष सैन्य नेतृत्व भी शामिल हुआ था। टीटीपी के साथ बैठक में शामिल सदस्यों ने सरकार और सेना को बताया कि अफगान तालिबान प्रतिबंधित आतंकवादी समूह तहरीक-ए-तालिबान साथ बातचीत में सहयोग प्रदान कर रहा है। पिछले कई हफ्तों में अफगानिस्तान में पाकिस्तान के प्रतिनिधियों और प्रतिबंधित टीटीपी के बीच कई बैठकें हुई हैं।
दरअसल,पिछले हफ्ते, अफगान तालिबान के प्रवक्ता ने काबुल में बताया था कि इस बैठक के सकारात्मक परिणाम की उम्मीद में दोनों पक्षों के बीच बातचीत समाप्त हो गई थी। इस बैठक में पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व कई शीर्ष अधिकारियों के अलावा कई ट्राइबल नेताओं ने किया। इन नेताओं की पकड़ टीटीपी के प्रभाव वाले इलाकों में काफी ज्यादा है। अफगान तालिबान सरकार, विशेष रूप से हक्कानी नेटवर्क, पाकिस्तानी सरकार और टीटीपी के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य कर रहा है। इन्हीं बैठकों और तालिबान के दबाव के कारण टीटीपी ने अनिश्चित काल के लिए युद्धविराम की घोषणा की थी। इतना नहीं इस समझौते में बीजिंग की भी भूमिका सामने आई थी,चूंकि चीन हर हालत में TTP और पाकिस्तान के बीच समझौता चाहता था,क्योंकि पाकिस्तान में चीन के कई प्रोजेक्ट विभिन्न हमलों की वजह से प्रभावित हो चुका है,जिसे फिर से चालू करने के लिए TTP के साथ पाकिस्तान का समझौता बहुत जरूरी था ऐसे में बीजिंग अपने फायदे के लिए पाकिस्तान में इस आतंकी गुट को सक्रिय रहने के लिए तैयार है,भले ही पाकिस्तान में संघर्ष बढ़े लेकिन चीन का लाभ प्रभावित न हो सके,लेकिन अब तस्वीर साफ है शहबाज सरकार ने साफ कर दिया है कि वह TTP के असंवैधानिक मांगों को खारिज करता है।
चूंकि,टीटीपी का पहला मकसद है पाकिस्तान में शरिया कानून लागू करना। ऐसे में अगर पाकिस्तान सरकार ने प्रमुख मांगों को ठुकरा दिया तो टीटीपी संघर्ष विराम को तोड़ सकता है। इस कारण खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में आतंकवादी घटनाएं तेजी से बढ़ सकती हैं। टीटीपी के आतंकवादी हमला करने के बाद अफगानिस्तान में जाकर छिप जाते हैं। ऐसे में पाकिस्तान अब तालिबान के विरोध के कारण अफगानिस्तान में घुसकर उनके खिलाफ कार्रवाई भी नहीं कर सकता है। इसके अलावा पाकिस्तानी सेना पर भी पश्चिमी और उत्तरी सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी काफी बढ़ सकती है।
