
सांकेतिक तस्वीर।
स्टॉकहोम। स्वीडन और डेनमार्क में पिछले कुछ महीनों में मुस्लिमों की पवित्र धार्मिक पुस्तक कुरान जलाने की घटना अब तूल पकड़ती दिख रही है। तब स्वीडन ने कहा था कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत कुछ नहीं कर सकता है। लेकिन,जून के बाद कई अन्य घटनाएं देखी गई हैं,जिसके कारण अब इस बात की चर्चा हो रही है कि स्वीडन और डेनमार्क अपने कानूनों में समीक्षा करने की जरूरत समझ रहे है।
दरअसल,स्वीडन और डेनमार्क के संविधान में लंबे समय से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। लेकिन दोनों देशों ने रविवार को संकेत दिया है कि वे सुरक्षा और जियोपॉलिटिक्स की चिंतिआों को देखते हुए कुरान के अपमान से जुड़े प्रदर्शनों को रोकने के लिए कानूनी तरीके तलाश रहे हैं। स्वीडिश प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन ने कहा कि वीकेंड के दौरान उन्होंने अपने डेनिश समकक्ष से इस मुद्दे पर गहरी बातचीत की। दोनों ही देशों ने एक ही तरह का विश्लेषण साझा किया है। दोनों देश मानते हैं कि स्थिति खतरनाक है और इसे रोकने के लिए मजबूत उपाय करने की जरूरत है।
चूंकि,स्वीडन की घटना के बाद इराक में स्वीडिश दूतावास के सामने प्रदर्शन हुए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उनके संविधान में बड़े पैमाने पर है। यहां ईशनिंदा का कोई कानून नहीं है। इसका मतलब है कि यहां किसी भी धार्मिक ग्रंथ का अपमान करना गैरकानूनी नहीं है। स्वीडन में किसी भी तरह के प्रदर्शन को पुलिस की इजाजत मिल जाती है। सिर्फ सुरक्षा के आधार पर इसे नकारा जा सकता है। ऐसे में कुरान जलाने की घटना को दुनिया के भर के तमाम मुस्लिम देश बेहद गंभीरता से देख रहे हैं। यही कारण है कि यहां किसी भी तरह की गंभीर आत्मघाती हमलों की संभावना को रोकने के लिए इस तरह के कानूनों में जल्द ही संशोधन करने पर विचार किया जा रहा है।
