पाकिस्तान के पश्तून समुदाय के लिए आज का दिन एक काली तारीख के तौर पर दर्ज है. दरअसल, 12 अगस्त 1948 को पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत (NWFP) में बबरा नरसंहार (Babrra massacre) हुआ. यहां पर ‘खुदाई खिदमतगार आंदोलन’ (Khudai Khidmatgar movement) के निहत्थे पश्तून समर्थकों पर सामूहिक गोलीबारी की गई. इस हमले में 611 पश्तून समर्थकों की मौत हो गई और 1200 के करीब घायल हो गए. हमले का आदेश NWFP के मुख्यमंत्री अब्दुल कय्यूम खान कश्मीरी ने दिया. इसके बाद चारसड्डा जिले के बबरा मैदान में गोलीबारी हुई.
खुदाई खिदमतगार अब्दुल गफ्फार खान (बच्चा खान) के नेतृत्व में एक अहिंसक प्रतिरोध आंदोलन था. ये शुरू में ब्रिटिश राज में पश्तूनों की स्थिति में सुधार पर केंद्रित था और बाद में अंग्रेजों से आजादी पर केंद्रित हो गया. 1930 तक पश्तून राजनीतिक में बहुत अधिक एक्टिव नहीं थे. लेकिन बाद में वे राजनीतिक रूप से अधिक सक्रिय हो गए और इस आंदोलन का समर्थन किया. 1937 में इस आंदोलन ने कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन में उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (वर्तमान खैबर पख्तूनख्वा) का चुनाव जीता. इसके बाद अब्दुल गफ्फार खान के भाई खान अब्दुल जब्बार खान को मुख्यमंत्री बनाया गया.
मुहम्मद अली जिन्ना ने NWFP के सीएम को किया टर्मिनेट
1946 के चुनावों में भी इस आंदोलन को पूर्ण बहुमत मिला. बन्नू प्रस्ताव के बावजूद जिसमें खुदाई खिदमतगारों ने मांग की थी कि प्रांत स्वतंत्र हो जाना चाहिए या अफगानिस्तान में शामिल हो जाना चाहिए. NWFP 1947 के जनमत संग्रह के परिणामस्वरूप पाकिस्तान के डोमिनियम में शामिल हो गया. इसका आंदोलन द्वारा बहिष्कार भी किया गया. बबरा नरसंहार के पहले NWFP में खान अब्दुल जब्बार खान की निर्वाचित प्रांतीय सरकार को पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्ना ने टर्मिनेट कर दिया. उनकी जगह मुस्लिम लीग के नेता अब्दुल कय्यूम खान कश्मीरी को 23 अगस्त 1947 को प्रांत का मुख्यमंत्री बनाया गया.
नए सीएम ने खान अब्दुल जब्बार खान को किया कैद
वहीं, नई प्रांतीय सरकार ने खुदाई खिदमतगार आंदोलन के नेता अब्दुल गफ्फार खान के साथ-साथ खान अब्दुल जब्बार खान को कैद कर लिया गया. जुलाई 1948 में, NWFP के ब्रिटिश गवर्नर एम्ब्रोस फ्लक्स डंडास ने एक अध्यादेश जारी किया, जिसमें प्रांतीय सरकार को किसी को भी हिरासत में लेने और बिना कोई कारण बताए उनकी संपत्ति को जब्त करने के लिए अधिकृत किया गया. 12 अगस्त 1948 को खुदाई खिदमतगार आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने अपने नेताओं की गिरफ्तारी और सरकार द्वारा लागू किए गए नए अध्यादेश का विरोध किया. निहत्थे प्रदर्शनकारियों ने चारसड्डा से बबरा मैदान तक शांतिपूर्ण मार्च निकाला.
घायलों को नदी में फेंका गया
हालांकि, प्रदर्शनकारी जब बबरा मैदान पहुंचे तो अब्दुल कय्युम खान ने पुलिस और मिलिशया बलों को प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाने का आदेश दिया. इस दौरान सैकड़ों की संख्या में प्रदर्शनकारियों की मौत हुई. पुलिस और मिलिशिया ने कई शवों और कुछ घायलों को काबुल नदी में फेंक दिया. कुछ घायल नदी में डूब गए. जब पुलिस और मिलिशिया चले गए, तो प्रदर्शनकारियों के प्रियजनों द्वारा शवों को नदी से बरामद किया गया और चारसड्डा बाजार ले जाया गया. हालांकि, कुछ शवों को कभी ढूंढा नहीं जा सका. इस नरसंहार में 600 से ज्यादा पश्तून मारे गए और लगभग 1200 घायल हुए.
