स्पेशल रिपोर्ट

सेकेंड वर्ल्ड वाॅर के दौरान जब ब्रिटिश PM “चर्चिल” ने “स्पेशल ऑपरेशंस एक्जीक्यूटिव” को सुभाष चंद्र बोस की हत्या का दिया था टास्क – चंद्रकांत मिश्र (एडिटर इन चीफ)


विंस्टन चर्चिल ब्रिटिश PM, फोटो साभार-(सोशल मीडिया)

नई दिल्ली। सेकेंड वर्ल्ड वाॅर के दौरान ब्रिटेन के लिए एक तरफ सबसे बड़ा खतरा जर्मनी था तो वही दूसरी ओर भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस। बता दे कि सुभाष चंद्र बोस से उस समय ब्रिटिश हुकूमत की इतनी स्थिति खराब हो गई थी कि ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने अपनी उस सीक्रेट फोर्स को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या करने का टास्क दिया था जिसे कि नाजियों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए बनाया गया था।

दरअसल, सेकेंड वर्ल्ड वाॅर के दौरान नाजियों के खिलाफ तत्कालीन ब्रिटिश PM चर्चिल ने एक सीक्रेट फोर्स का गठन किया था जिसे ‘चर्चिल्स प्राइवेट आर्मी’ का नाम दिया गया था, स्पेशल ऑपरेशंस एक्जीक्यूटिव (SOE) नाम के इस सीक्रेट फोर्स की स्थापना विंस्टन चर्चिल ने नाजियों से लड़ने के लिए वर्ष 1940 में की थी। इसके संचालन पर गोपनीयता का ऐसा आवरण था कि यह लंदन में बेकर स्ट्रीट पर एक गैर-वर्णित घर से कार्य करता था। जिसके अस्तित्व के बारे में बहुत कम लोग जानते थे।

जहां बोस SOE के रडार पर तब आए जब उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मित्र देशों की सेना के खिलाफ INA को खड़ा किया और उसका नेतृत्व किया। हालांकि,नेताजी सुभाष स्पष्ट रूप से बाल-बाल बच गये थे, क्योंकि SOE के बारे में कहा जाता था कि वह अपने लक्ष्यों का पीछा करने में कठोर था और उसे हथियारों का उपयोग किए बिना भी मारने के लिए प्रशिक्षित किया गया था। 13,000-मजबूत बल सभी बाधाओं के बावजूद तोड़फोड़ और अदृश्य युद्ध में लगा हुआ था। युद्ध के चरम पर, फ्रांस में एक SOE ऑपरेटिव सिर्फ छह सप्ताह तक जीवित रहने की उम्मीद कर सकता था।

बताया जाता है कि SOE का भारत के साथ गहरा संबंध था। क्योंकि,इसके पहले चीफ सर फ्रैंक नेल्सन थे, जिन्होंने पहले बॉम्बे चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया था और वर्ष 1923 में एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऑफ इंडिया के अध्यक्ष बने थे। SOE प्रमुख के रूप में उनका काम इतना तनावपूर्ण था कि उन्होंने दो साल के भीतर ही नौकरी छोड़ दी। इस फोर्स के पास जाहिर तौर पर भारत मिशन नामक एक इकाई थी, जो शुरू में भारत में स्थित थी और बाद में श्रीलंका में तैनात थी। यहीं से इसे फोर्स-136 कहा जाने लगा, जिसे क्वाई नदी पर ब्रिज में फोर्स 316 नाम मिला।

गौरतलब है कि भारत से अंग्रेजों को भगाने के लिए सेकेंड वर्ल्ड वार के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत से बाहर निकल कर जर्मनी और जापान की मदद से आजाद हिंद फौज का सफल नेतृत्व किया, तथा अंडमान निकोबार द्वीपसमूह पर सफलतापूर्वक कब्जा भी किया, जहां इस दौरान धुरी देशों की हार के बाद सुभाष चंद्र बोस अपनी फौज को डिसबैंड कर दिये और फौज से जुड़े सभी लोगों को मिशन रद्द करने का हुकुम देकर, खुद अंडरकवर हो गए। जहां कथित तौर पर यह दावा किया गया कि 18 अगस्त 1945 को ताइपे में एक विमान दुर्घटना में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत हो गई, लेकिन स्वतंत्र रूप से इस हादसे की आजतक पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल, ब्रिटिश हुकूमत के लिए सबसे बड़े खतरे के तौर पर उभरकर सामने आने वाले सुभाष चंद्र बोस को खत्म करने की साजिश चर्चिल की फेल साबित रही।

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