सतीश उपाध्याय ( स्पेशल-एडिटर )
खुफ़िया एजेंसी को अंग्रेज़ी में कहते हैं, इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट. इंटेलिजेंस माने बुद्धि. अक्लमंदी. इसलिए कि खुफ़िया जानकारियां जुटाना बड़ी चतुराई का काम है. काम करो. इतनी सफ़ाई से करो कि किसी को भनक न लगे. इतना क्लीन काम कि पीछे कोई सबूत न छूटे. लेकिन आज की हमारी कहानी थोड़ी अलग है.
आलसी जासूसों की फौज़
ये कहानी है एक ऐसी टॉप खुफ़िया एजेंसी की जिसके जासूसों का दुनियाभर में ख़ूब मज़ाक बनता है. लोग उन्हें ‘अनइंटेलिजेंट’ कहते हैं. मीडियावाले कहते हैं कि अगर इस एजेंसी के जासूसों पर कोई फिल्म बने, तो वो स्पाई थ्रिलर नहीं होगी. वो कॉमेडी फिल्म बन जाएगी. ये कहानी है एक ऐसी स्पाई एजेंसी की, जो अपने आलसी जासूसों से परेशान है. उसके जासूस काबिल तो बहुत हैं. खूंखार भी काफी हैं. मगर आलसी इतने हैं कि कोई सीक्रेट, सीक्रेट ही नहीं रख पाते. गुप्त मिशन पर जाते हैं और अपने सुराग छोड़ आते हैं. इतने लापरवाह जासूस कि अपना चेहरा तक नहीं छुपा पाते. उनके छोड़े सबूत इतने ठोस होते हैं कि विदेशी खुफ़िया एजेंसियों की मेहनत बच जाती है. सबूत ख़ुद ही चीख-चीखकर कल्प्रिट का नाम बता देते हैं. इन जासूसों के आलस के कारण इनकी अपनी सरकार तंग है. और मज़े की बात ये है कि उस सरकार का मुखिया ख़ुद भी कभी जासूस रहा था.
ये किस खुफ़िया एजेंसी की बात कर रहे हैं हम? उसका नाम बताएंगे, मगर उससे पहले उसके जासूसों की लापरवाही से जुड़ा एक मज़ेदार क़िस्सा सुनाते हैं आपको.
कहानी तो सुन लीजिए
नीदरलैंड्स में एक शहर है- हेग. यहां OPCW का मुख्यालय है. OPCW यानी, ऑर्गनाइज़ेशन फॉर द प्रोहिबिशन ऑफ केमिकल वीपन्स. ये एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है. जिसका काम है, प्रतिबंधित केमिकल हथियारों पर नज़र देखना. ये सुनिश्चित करना कि कहीं कोई केमिकल हथियारों का इस्तेमाल न करे.
अप्रैल 2018 की बात है. नीदरलैंड्स की पुलिस ने एक कार में बैठे चार लोगों को पकड़ा. ये चारों चोरी-छिपे OPCW में घुसने की कोशिश कर रहे थे. इन चारों में से एक आदमी था- एलेक्सी मॉरेनेट्स. पुलिस ने इसकी कार का रजिस्ट्रेशन नंबर चेक किया. वो कार रजिस्ट्रेड थी, मॉस्को के एक पते पर. ये पता था, कोमोसोमोल्स्की प्रोस्पेक्ट 20. जानते हैं, ये अड्रेस किसका है? ये अड्रेस है, रूसी डिफेंस मिनिस्ट्री कॉम्प्लैक्स का. इसी कॉम्प्लैक्स में रूसी खुफ़िया एजेंसी का दफ़्तर भी है. डच पुलिस को इन चारों के पास से हैकिंग वाले उपकरण मिले. इनके पास से एक लैपटॉप भी मिला. उसमें पहले किए गए कुछ साइबर अटैक्स का डेटा सुरक्षित रखा हुआ था.
सबसे मज़ेदार चीज जो बरामद हुई, वो थी एक रसीद. रसीद एक टैक्सी की, जिसे किराये पर लिया गया था. एक रूसी खुफ़िया एजेंसी के ऑफिस से मॉस्को एयरपोर्ट तक जाने के लिए. अब आप सोचिए. आप सीक्रेट मिशन पर भेजे गए हैं. और आपके पर्स में रखी है एक रसीद. रसीद, जो एक नज़र में बता देगी कि आपको किसने भेजा है. ‘अल जज़ीरा’ के एक पत्रकार ने इस ख़बर पर लिखा कि उस एजेंट ने टैक्सी की रसीद संभाली होगी. शायद इसलिए कि मॉस्को लौटकर पैसा रिइम्बर्स करवा सके.
अफ़गानिस्तान में रूस से अमेरिकी सैनिकों पर हमले करवाए?
इस मिसाल से आप इतना तो जान गए होंगे कि हम रूस की बात कर रहे हैं. मगर आज क्यों कर रहे हैं? इसलिए कि उसकी एक खुफ़िया एजेंसी को लेकर बवाल मचा हुआ है. ये एजेंसी पिछले कुछ दिनों से दुनियाभर की हेडलाइन्स में है. और इन हेडलाइन्स का संबंध है, रूस की एक मिलिटरी इंटेलिजेंस यूनिट से. इन हेडलाइन्स की शुरुआत हुई 26 जून को. इस रोज़ न्यू यॉर्क टाइम्स ने एक एक्सक्लूज़िव ख़बर चलाई. इसके मुताबिक, रूस की सैन्य खुफ़िया एजेंसी तालिबान को पैसे दे रही है. किसलिए? ताकि वो अफ़गानिस्तान में पोस्टेड अमेरिकी सैनिकों समेत NATO फोर्सेज़ के लोगों पर जानलेवा हमला करे. उन्हें मारे. 2019 में ही अफ़गानिस्तान के अंदर 20 अमेरिकी सैनिक घात लगाकर मारे गए. लेकिन इनमें से कौन सी और कितनी हत्याओं के पीछे रूस का हाथ है, ये जानकारी अभी बाहर नहीं आई है. NYT के बाद वॉशिंगटन पोस्ट और वॉल स्ट्रीट जरनल समेत कई अख़बारों ने भी ये ख़बर छापी.
26 जून को छपी न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट
अमेरिकी रक्षा मुख्यालय पेंटागन ने भी इन ख़बरों की पुष्टि की है. 9 जुलाई को पेंटागन चीफ मार्क एस्पर का इसपर बयान आया. उन्होंने कहा कि तालिबान और रूसी पेमेंट वाली खुफ़िया रिपोर्ट से वो भी वाकिफ़ हैं. मार्क एस्पर ने ये बयान दिया अमेरिकी संसद की आर्म्ड सर्विसेज़ कमिटी के आगे. कमिटी ने उन्हें इस मामले में पूछताछ के लिए तलब किया था. पेंटागन चीफ के अलावा चेयरमैन ऑफ द जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ मार्क मेली को भी तलब किया गया था.
रूस पर लगे इन इल्ज़ामों का मतलब क्या है? इसका मतलब है, ऐक्ट ऑफ वॉर. यानी एक देश द्वारा दूसरे देश के खिलाफ़ की गई युद्ध संबंधी भड़काऊ गतिविधि. अगर ये साबित हो जाता है कि रूसी इन्वॉल्वमेंट के कारण अमेरिकी सैनिकों की जान गई, तो इससे तनाव काफी भड़क सकता है.
GRU की कहानी और यूनिट 29155
रूस की किस खुफ़िया यूनिट का नाम लिया जा रहा है इसके पीछे? इस यूनिट का नाम है- यूनिट 29155. ये यूनिट रूस की एक खुफ़िया एजेंसी का हिस्सा है. कौन सी एजेंसी? इस एजेंसी का आधिकारिक नाम है- मेन डायरेक्टोरेट ऑफ द रशियन जनरल चीफ ऑफ स्टाफ. शॉर्ट में इसको कहा जाता है, GU. मगर ये GU इस एजेंसी का प्रचलित नाम नहीं है. इसका प्रचलित नाम है, GRU.
ये GU और GRU का क्या चक्कर है? ये चक्कर है पुराने माल की नई पैकेज़िंग का. आधुनिक रूसी इतिहास के दो मुख्य दौर हैं. एक, 1991 से पहले का इतिहास. जब रूस था सोवियत संघ का हिस्सा. दूसरा, सोवियत विघटन के बाद वाला रूस. सोवियत वाले दौर में उसकी एक एजेंसी हुआ करती थी. जिसका रूसी नाम था, ग्लेवनोए रेज़वेदिवातेलनोए उपरावेलनिए. इसी एजेंसी को शॉर्ट में कहते थे, GRU. इसका काम था, विदेशी सेनाओं से जुड़ी खुफ़िया जानकारियां इकट्ठा करना. सोवियत विघटन के बाद इसका नए सिरे से गठन हुआ. इसे नया नाम मिला- जेनरालनोगो श्ताबा. इसका शॉर्टकट है, GU. नाम के इस फ़र्क के अलावा दोनों संगठनों में कुछ खास अंतर नहीं था. लोग कहते कि बदलाव बस इतना ही है कि नाम में से एक अक्षर उड़ गया है. ऐसे में इसका पुराना नाम GRU ही प्रचलित रहा.
GRU का काम क्या है?
क्या काम करती है GRU? देखिए, विदेश में सक्रिय खुफ़िया एजेंसियों के दो मुख्य काम होते हैं. पहला, राजनैतिक महत्व की जानकारियां लाना. दूसरा, सैन्य महत्व की जानकारियां जमा करना. दोनों अपने आप में बड़ी चुनौतियां हैं. ऐसे में कई देश अपनी फॉरेन सीक्रेट सर्विस को दो हिस्सों में बांट देते हैं. सोवियत में भी ऐसा ही बंटवारा था. KGB देखती थी बाहरी देशों से जुड़ी पॉलिटिकल और सिविलियन इंटेंलिजेंस का काम. GRU देखती थी, विदेशी मिलिटरी इंटेलिजेंस का काम. KGB की जगह अब रूस में है, SVR. और GRU की जगह है GU. इन दोनों के अलावा एक खुफ़िया एजेंसी और है- FSB. ये रूस की घरेलू सुरक्षा और उससे जुड़े खुफ़िया ऑपरेशन्स देखती है. व्लादीमिर पुतिन इसी FSB का हिस्सा थे.
अब फिर से लौटते हैं GRU पर. किसके प्रति जवाबदेह है GRU? इसकी कमांड है, रूसी रक्षा विभाग के पास. ये एजेंसी रिपोर्ट करती है तीन लोगों को. एक, रूसी राष्ट्रपति. दूसरे, रूस के रक्षा मंत्री. और तीसरे, रूस के चीफ ऑफ द जनरल स्टाफ यानी तीनों सेनाओं के मुखिया को. अब जानिए कि इस वक़्त इन तीनों पदों पर कौन-कौन हैं. राष्ट्रपति हैं, व्लादीमिर पुतिन. रक्षा मंत्री हैं, सेरगी शोइगु. चीफ ऑफ द जनरल स्टाफ हैं, वेलरी गेरासिमोव. यानी, रूस के तीन सबसे ताकतवर लोग.
क्या ख़ासियत है GRU की? इनकी ख़ासियत है, मल्टीटास्किंग. साइबर हैकिंग करनी हो. या डबल क्रॉस करके विदेश भाग गए रूस के पूर्व जासूसों को ठिकाने लगाना हो. दूसरे देशों की सेना और सैन्य क्षमताओं की रपट लाने के अलावा इन्हें कई बार पॉलिटिकल काम भी पकड़ा दिए जाते हैं. मसलन, किसी और देश के इलेक्शन को हाइजैक करना. या कहीं स्थानीय लोगों को रिक्रूट करके सरकार का तख़्तापलट करवाना. साइकोलॉजिकल, साइबर, केमिकल हर तरह के अटैक करने में माहिर है ये.
जब माहिर हैं तो लगातार नाकाम कैसे हो जाते हैं?
GRU अक़्सर सुर्खियों में रहती है. कई बार अपने नाकाम ऑपरेशन्स के लिए. कई बार ऑपरेशन्स के दौरान ढेर सारे सबूत पीछे छोड़कर जाने के लिए. कभी एक जैसी ग़लतियां बार-बार दोहराने के लिए. ये इतनी आलसी मानी जाती है कि अपने एजेंट्स के फर्ज़ी नामों पर भी मेहनत नहीं करती. अलग-अलग ऑपरेशन्स में भी वही नाम बार-बार इस्तेमाल कर लेती है. इनके आलस्य का ही नतीजा है कि खुफ़िया एजेंसियों को तो दूर छोड़िए. इंटरनेट पर मौजूद ओपन सोर्स का इस्तेमाल कर खोजी पत्रकार तक इनका पूरा रूटचार्ट, असली पहचान, मोबाइल नंबर, पासपोर्ट नंबर, सर्विस रेकॉर्ड, इनकी यूनिट के बाकी साथियों का ब्योरा सामने रख देते हैं. इन्हीं कारणों से GRU दुनिया की ऐसी खुफ़िया एजेंसी मानी जाती है, जिसके बारे में सबसे ज़्यादा जानकारियां उपलब्ध हैं.
जैसे सेना में अलग-अलग टुकड़ियां होती हैं. उसी तरह GRU में भी कई यूनिट्स हैं. इन्हीं में से एक है- यूनिट 29155. इल्ज़ाम है कि इसी यूनिट 29155 ने अमेरिकी सैनिकों को मरवाने के लिए तालिबान को पैसा दिया. पैसा देने की बात कैसे पकड़ आई? रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिन बैंक खातों से तालिबान को पेमेंट गई वो बैंक अकाउंट्स सीधे GRU से जुड़े हैं. पेमेंट करने वालों ने अपने पीछे इतना ट्रेल छोड़ा था कि GRU से लिंक जोड़ने में कोई दिक्कत नहीं हुई.
सेरगी स्क्रिप्ल केस
ये यूनिट 29155 पहले भी कई बार सुर्खियों में आ चुकी है. इन्हें लोगों की नज़रों में लाने वाला सबसे मशहूर मामला था, 2018 का सेरगी स्क्रिप्ल केस. सेरगी स्क्रिप्ल रूस के पूर्व जासूस थे. 2018 में सेरगी और उनकी बेटी यूलिया पर नर्व एजेंट से हमला हुआ. इस पॉइज़निंग में शामिल थे दो लोग. उन्होंने अपने पीछे भरपूर सुराग छोड़े थे. ब्रिटेन में उनके एक-एक मूवमेंट को ट्रेस कर लिया गया. CCTV फुटेज से दोनों की साफ-साफ तस्वीरें मिल गईं. पता चला, ये दोनों रूस के पासपोर्ट पर ब्रिटेन आए थे. पासपोर्ट के मुताबिक, दोनों के नाम थे- रुसलान बोशिरोव और अलेक्जांदेर पेत्रोव. ये दोनों नाम फर्जी निकले. आसानी से साबित हो गया कि ये दोनों रूस के जासूस हैं. उनका असली नाम, सर्विस रेकॉर्ड सब सामने आ गया. पता चला कि इन दोनों में से एक को ‘हीरो ऑफ रशिया’ का अवॉर्ड भी मिला हुआ है. ये रूस का सबसे बड़ा सैन्य सम्मान है.
पहचान जाहिर करने में इन दोनों एजेंट्स से जो थोड़ी-बहुत कसर छूटी, उसे पूरा किया इस पॉइज़निंग में शामिल एक तीसरे आदमी ने. इस आदमी का असली नाम था- डेनिस सेरगेयेव. मगर ये अपने असली नाम से ब्रिटेन नहीं आया था. ये आदमी सेरेगी फेदोतोव का नाम धरकर ब्रिटेन पहुंचा था. जब इस नाम की ट्रैवल हिस्ट्री खंगाली गई, तो एक सिरा पहुंचा बुल्गारिया. वहां 2015 में एक आर्म्स लीडर को ज़हर देकर मारने की कोशिश हुई थी. पता चला कि उस मामले में भी सेरेगी फेदोतोव नाम का एक आदमी शामिल था.
इन्वेस्टिगेटिव न्यूज़ वेबसाइट ‘बेलिंगकैट डॉट कॉम’ के खोजी पत्रकारों ने इस नाम की कुंडली खंगाली. बेलिंगकैट को फ्लाइट रेकॉर्ड्स, पैसेंजर डेटा, रूसी सीमा से बाहर आने-जाने के ब्योरे सब इंटरनेट पर आसानी से मिल गए. इन रेकॉर्ड्स से पता चला कि सेरेगी फेदोतोव का यूरोप, सेंट्रल एशिया, यूक्रेन और मिडिल ईस्ट में अक्सर आना-जाना होता है. और खंगालने पर सेरेगी फेदोतोव की यूनिट के बाकी कई साथियों की भी जानकारी मिल गई. और इस तरह यूनिट 29155 का कच्चा-चिट्ठा खुला. इस डिस्कवरी की एक सबसे बुनियादी वजह ये थी कि ज़्यादातर एजेंट्स एक ही फर्ज़ी नाम का बार-बार इस्तेमाल करते थे. यूनिट 29155 का नाम जिन बड़े आरोपों से जुड़ा है, उनमें से कुछ आपको गिना देते हैं-
1. 2016 में हिलरी क्लिंटन के ईमेल्स लीक कर राष्ट्रपति चुनाव प्रभावित करने की कोशिश
2. 2016 में दक्षिणी यूरोप स्थित देश मॉन्टेनेग्रो में तख़्तापलट की कोशिश
3. 2017 में स्पेन के कैटेलोनिया प्रांत में अलगाववादी लहर भड़काना
हैक करने गए और खुद की पतरी छोड़ गए
यूनिट 29155 अकेली कमज़ोर कड़ी नहीं है GRU की. ऐसी कई यूनिट्स हैं. मसलन, यूनिट 26165. इस यूनिट का नाम 2014 में यूक्रेन के ऊपर जो MH-17 पैसेंजर जेट गिराया गया था, उस मामले में है. इसके अलावा 2017 में फ्रेंच राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के ईमल हैक करने में भी इनका नाम है. इस हैकिंग में यूनिट 26165 का नाम ऐसे पता चला कि इसके हैकर्स अपने पीछे मेटाडेटा छोड़ गए थे. इसमें जॉर्जी पेट्रोविक रोश्का नाम के एक आदमी का नाम मिला. खंगालने पर पता चला कि ये आदमी GRU यूनिट 26165 में काम करता है.
‘स्पीगल इंटरनैशनल’ ने अपनी एक रिपोर्ट में 2018 का एक क़िस्सा बताया. 5 नवंबर, 2018 को GRU का 100वां जन्मदिन था. हर साल इस मौके पर मॉस्को स्थित GRU मुख्यालय में प्रोग्राम होते हैं. लेकिन 2018 वाले साल इस दिन हुई एक इमरजेंसी मीटिंग. इसमें रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने GRU को खूब डांट पिलाई. कहा-
तुम लोग हद दर्जे के नाकाबिल और लापरवाह हो.
फिर एक अधिकारी ने खीझते हुए GRU के जासूसों से कहा-
ऐसा क्यों नहीं करते कि मिशन के दौरान माथे पर बुदेनोवका पहन लो.
पता है, बुदेनोवका क्या चीज है? ये एक ख़ास तरह की टोपी होती थी. ऊन से बनी एक टोपी, जिसके सामने बना होता था एक बड़ा सा लाल सितारा. सोवियत का प्रतीक, रेड स्टार. इसको सोवियत की रेड आर्मी के सैनिक पहना करते थे. इस टोपी के कारण दूर से ही पता लग जाता था कि सोवियत के सैनिक हैं. रक्षा अधिकारी ने ये बुदेनोवका वाली बात ताना देते हुए कही थी. इसका मतलब था कि वैसे भी इतने सबूत छोड़ आते हो. इससे बढ़िया तो ये होगा कि माथे पर ही अपनी असली पहचान गुदवा लो.
